शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2008

उच्च शिक्षा में गुणवत्ता मूल्यांकन समय की देन

उच्च शिक्षा में गुणवत्ता मूल्यांकन समय की देन
हर्ष भाल

उच्च शिक्षा में गुणवत्ता मूल्यांकन समय की देन

गुणवत्ता और उत्कृष्टता को लेकर जितना गहन विचार-विमर्श इन दिनों किया जा रहा है, वैसा पहले कभी नहीं किया गया। 'गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए मूल्यांकन' की 20वीं सदी के उत्तरार्ध्द से विश्व भर में व्यापक चर्चा की जा रही है। इस पूरे आंदोलन को 'मूल्यांकन संस्कृति' को प्रोत्साहित करने के रूप में देखा जा सकता है। भारत में इस आंदोलन ने केवल पिछली सदी के अंतिम दशक में उस समय ठोस रूप धारण किया, जब राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (एनएएसी) (1994 में) की स्थापना की गयी। उच्च शिक्षा ंसस्थानों और कार्यक्रमों के मूल्यांकन के लिए सरकारी क्षेत्र में कुछ अन्य मूल्यांकन संगठन भी अस्तित्व में आये।

राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद का उद्देश्य 'भारत में स्व मूल्यांकन एवं बाहरी गुणवत्ता मूल्यांकन के सामंजस्य के जरिए उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और विशिष्टताओं की जांच करना है। परिषद 3,644 उच्च शिक्षा संस्थानों (22.12.2007 तक) का मूल्यांकन एवं प्रत्यायन कर चुकी है, और उसने अनेक गुणवत्ता प्रोत्साहन गतिविधियाेंं को अंजाम दिया है। बाहरी गुणवत्ता मूल्यांकन के बारे में उच्च शिक्षा संस्थानों और शैक्षिक जगत से मिलीजुली प्रतिक्रिया प्राप्त हुई है। कई संस्थानों ने स्वेच्छा से राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद के मूल्यांकन को अपनाया है और अपने प्रत्यायन स्तर को गर्व के साथ प्रदर्शित किया है। कुछ संस्थन ऐसे भी हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद के मूल्यांकन के प्रति आशंकायें व्यक्त की है। बाहरी गुणवत्ता मूल्यांकन की जटिल प्रक्रिया की गहन समझ के लिए यह उपयोगी होगा कि एक तरफ राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद के मूल्यांकन की सहज मांग के लिए प्रेरक घटकों की विश्लेषणात्मक जांच की जाए, वहीं दूसरी ओर इस तरह के मूल्यांकन को हतोत्साहित करने वाले घटकों को समझ लिया जाए।

रचनात्मक दृष्टिकोण

संस्थानों द्वारा राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद के मूल्यांकन को अपनाने के पीछे निम्नांकित कारण हैं :

; इससे संस्थानों की उत्कृष्टता#उपलब्धियों की पहचान कायम होती है।

; संस्थानों को अपनी क्षमता एवं सीमाओं को समझने का अवसर मिलता है, जिससे वे स्वयं सुधार

की ओर प्रेरित होते हैं।

; संस्थानों की छवि उजागर होती है और उन्हें दूरदराज के क्षेत्रों से विद्यार्थियों को आकर्षित करने

का अवसर मिलता है।

; संस्थानों को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता मिलती है और उनके विद्यार्थियों का विदेशी विश्वविद्यालयों में

दाखिला सुनिश्चित होता है।

; सरकारी और वित्त पोषण करने वाली अन्य एजेंसियों से प्रोत्साहन मिलते हैं।

; कुछ राज्य सरकारें इसके लिए आग्रह करती हैं।

; यह मूल्यांकन स्वायत्त#समकक्ष विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त करने और विश्वविद्यालय अनुदान

आयोग या संबध्द विश्वविद्यालयों द्वारा अन्य प्रकार की मान्यताएं या स्थायी संबध्दता प्रदान करने

के लिए पूर्व शर्त माना गया है।

कुछ आशंकाएं :

राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद के मॅल्यांकन के बारे में व्यक्त किए गए कुछ संदेह और आशंकाएं इस प्रकार हैं :

; अज्ञात होने का भय।

; निम्न ग्रेड प्राप्त होने का भय और#या वांछित प्रत्यायन स्तर हासिल न होने की आशंका।

; प्रबंधन समिति और स्टॉफ में तैयारी संबंधी कार्य (स्व अध्ययन रिपोर्ट में संस्थागत आंकड़ों का प्रस्तुतीकरण) शुरू करने के प्रति उत्साह में कमी।

; यह धारणा कि मूल्यांकन एक महंगी प्रक्रिया है।

; यह मान्यता कि मूल्यांकन से कोई परवर्ती लाभ नहीं होता।

; गुणवत्ता के बाहरी मूल्यांकन के बारे में आपत्तियां।

; राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद की पध्दति और प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता और साख के बारे में आपत्तियां।

; यह विश्वास कि यह प्रक्रिया फिलहाल अनिवार्य नहीं है और इसकी अनदेखी की जा सकती है।

राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद का उच्च शिक्षा संस्थानों से संबंध

उपरोक्त आशंकाओं में से ज्यादातर निराधार हैं। विश्वभर में बाहरी मूल्यांकन गारंटी एजेंसियों के अनुभव भी इसी तरह के रहे हैं। उच्च शिक्षा संस्थानों में गुणवत्ता गांरंटी देने वाली एजेंसियों से ंसबध्द अंतर्राष्टीय नेटवर्क ने बाहरी गुणवत्ता गारंटी एजेंसियों के लिए श्रेष्ठ पध्दतियों के बारे में जो दिशा निर्देश तय किए हैं, उनमें नेटवर्क और उच्च शिक्षा संस्थानों के बीच सहज संबंधों का आधार शामिल है। राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद और उच्च शिक्षा संस्थानों के बीच संबंध निम्नांकित मार्गदर्शक सिध्दांतों पर आधारित है :

; यह मान्यता कि संस्थागत और#या पाठयक्रम संबंधी गुणवत्ता गारंटी मुख्य रूप से उच्च शिक्षा संस्थानों की स्वयं की जिम्मेदारी है;

; संस्थानों और#या उनके पाठयक्रमों की शैक्षिक स्वायत्ता, पहचान और निष्ठा का सम्मान;

; ऐसे मानकों या मानदंडों का अनुप्रयोग, जो संबध्द पक्षों के साथ उचित सलाह मश्विरा करके तय किए गए हों; और

; इनका लक्ष्य संस्थान की गुणवत्ता में सुधार और जवाबदेही बढ़ाने, दोनो ही क्षेत्रों में योगदान करना है;

अभी बहुत कुछ करना बाकी है..

पिछले 13 वर्षों में राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद प्रारंभिक कठिनाइयों से उभरते हुए एक लंबा रास्ता तय कर चुकी है। परिषद के मूल्यांकनों के प्रति समझ बढ़ी है। राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद भलीभांति जानती है कि उसे अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए अभी बहुत कुछ करना बाकी है। इसके लिए परिषद को तीन प्रमुख मुद्दों का समाधान करना होगा :

; पहला यह कि परिषद को अभी बड़ी संख्या में संस्थानों का मूल्यांकन करना है। 11 वीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक सभी उच्च शिक्षा संस्थानों के मूल्यांकन का प्रथम चक्र पूरा करने के लिए उपयुक्त व्यवस्था का विकास करना होगा। इस प्रयोजन के लिए हमें बहु आयामी नीतियां विकसित करनी होंगी। कुूछ ऐसे उपाय हैं, जिन पर ध्यानपूर्वक विचार करने की आवश्यकता है। इनमें क्षेत्रीय#राज्य स्तरीय मूल्यांकन एजेंसियों की स्थापना, राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद द्वारा मान्यता प्राप्त निजी व्यावसायिक एजेंसियों#क्षेत्रीय मूलयांकन एजेंसियों को पाठयक्रम मूल्यांकन के लिए प्रोत्साहित करना , आदि शमिल है।

; दूसरे, मूल्यांकन के साधनों में निरंतर सुधार आवश्यक है। किसी जटिल प्रणाली के निष्पादन का मॅलयांकन करने के लिए हम जिस साधन का इस्तेमाल करते हैं, उसकी सीमाएं इस तथ्य से उजागर होती हैं, कि वह मात्रात्मक दृष्टि से मूल्यांकन योग्य और गुणात्मक दृष्टि से गोचर घटकों को एक ही माडल के अंतर्गत जोड़ने में अक्षम रहता है। इस स्थिति में सुधार के लिए उपयुक्त मूल्यांकन अनिवार्य हैं। ठीक ही कहा गया है कि ''यदि आप किसी वस्तु का मूल्यांकन नहीं कर सकते तो आप उसे समझ नहीं सकते; यदि आप किसी चीज को समझ नहीं सकते, तो आप उस नियंत्रण नहीं रख सकते; यदि आप किसी चीज पर नियंत्रण नहीं रख सकते तो आप उसमें सुधार नहीं कर सकते।'' गुणवत्त मूल्यांकन में हमें दो प्रश्नों पर निरंतर ध्यान देना होता है : क्या हम सही चीजों का मूल्यांकन कर रहे है और क्या हम सही ढंग से उनका मूल्यांकन कर रहे हैं? राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद अपने साधनों में निरंतर सुधार कर रही है। परिषद को उम्मीद है कि मानदंड, महत्तवपूर्ण पहलुओं और मूल्यांकन संकेतकों तथा 1 अप्रैल, 2007 से अपनायी गयी सामूहिक ग्रेड अंक औसत (सीजीपीए) के बीच बेहतर तालमेल से संस्थागत निष्पादन का अधिक कडा और भरोसेमंद मूल्यांकन संभव हो सकेगा।

; तीसरे, सहयोगी जोड़ीदार टीम की मूल्यांकन प्रक्रिया में महत्तवपूर्ण भूमिका होती है, जिसके अंतर्गत मूल्यांकन शामिल होते हैं। सहयोगी टीम राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद का सार्वजनिक स्वरूप है। इस टीम के सदस्यों का निर्णय मूल्यांकन और प्रत्यायन का आधार होता है। मूल्यांकन कर्ताओं के रूप में सही जोडीदारों का चयन और काम को अंजाम देने के लिए उनमें अपेक्षित व्यावसायिक कौशल सुनिश्चित करना चुनौतीपूर्ण कार्य हैं। राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद को मानव सीमाओं की जानकारी है और वह मूल्यांकनकर्ताओं को व्यावसायिक जानकारी निरंतर प्रदान करने के प्रयास करती है, ताकि यह कार्य बिना किसी पक्षपात के पूरा किया जा सकेऔर उपयुक्त एवं स्वीकार्य निर्णय दिए जा सकें।

दृष्टिकोण %

नई स्थितियों में कुछ अन्य सरोकार और नए मुददे पैदा हो सकते हैं। इन सरोकारों से अधिक महत्तवपूर्ण अपनी गतिविधियों के प्रति हमारा नजरिया है। राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद का मानना है कि गुणवत्ता को नियंत्रित नहीं बल्कि पोषित करने की आवश्यकता है। गुणवत्त आश्वासन मॉडल के संदर्भ में बीजाई, पोषण, और जलवायु निर्माण का खेतीहर मॉडल अधिक उपयुक्त है। भविष्य में संभवत: समयबध्द मूल्यांकन गतिविधि पर ध्यान केन्द्रित करने की बजाय राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद उच्च शिक्षा संस्थानों में आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन के पोषण और निरंतर मूल्यांकन पर अधिक ध्यान दे सकती है। यह भी समान रूप से समझने की बात है कि बाहरी गुणवत्ता मूल्यांकन सांकेतिक प्रक्रिया है न कि अनिवार्य या निर्धारक।

।श्री हर्ष भाल पत्र सूचना कार्यालय में अतिरिक्त महानिदेशक (एम एंड सी) हैं।

 

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